Sewabharathi (सेवा भारती) is a non-governmental organization in India. It works among the economically weaker sections and the tribal and indigenous communities in India. It runs thousands of service projects across India in the field of education, health care, rural development and rehabilitation of differently abled and special needs children. The organization runs a small office in the Mandi town of Himachal Pradesh. Long ago I got to know about a lady running a single-room school in the slums of the town. An hour long conversation that happened between us became an unforgettable memory of my life. A 49 year old lady teaching in the slums with a single aim to make a change in their lives is surely an eye opener. She expects that times will change because she has seen things changing in her life. She hopes that someday the educated youth of this country will consider education as a career option because if anything needs to be improved in our country then it is the educational system, which is not possible without the participation of young blood and that too out of choice.
When did you start with this center?
We started off with the center on 28 December 2006. I was going through a very rough phase and I could not see any light in my life. As they say good and bad are complementary to each other, it was my turn to see the better side of life. I met Mr. Sansar Chand, who was the then Head of Sewa Bharthi Mandi. It was from him I got to know about the task of teaching in the slums and I instantaneously said yes. As I was going back from the office I was wondering about what I had said in the office. The notoriety of those slums had reached my ears and now I was worried because teaching kids was one thing and dealing with their parents, who were drunk and abusive most of the times was another thing altogether.
कमरुनाग झील [Read Trek to Kamrunag Temple]हिमाचल में २७०० मीटर की ऊंचाई पे स्थित है और यहाँ देव कमरू का एक मंदिर है, जिसे महाभारत की कथा में रत्न्यक्ष के नाम से जाना गया है | मंदिर में आने वाले श्रद्धालु सिर्फ झील में ही चढ़ावा चढाते हैं, पैसा, रूपया, चांदी, और यहाँ तक की सोना भी | कुछ साल पहले तक वहां झील में गहने फेंके हुए दिख जाते थे, सिक्के आज भी फेंके जाते हैं | वहां एक बोर्ड लगा हुआ है जो कहता है की चढ़ावा सिर्फ झील में चढ़ाएं, ऐसा देवता का कहना है | देव कमरुनाग पूरे मंडी जिले का देवता है, और ये माना जाता है की साल की पहली बारिश देवता के आदेश/आशीर्वाद से होती है | कहानी कहती है कि एक बार कुछ डाकू आये और झील का सोना लूट के निकल लिया, उन सबकी आँखें फूट गयी, सब के सब अंधे हो गए | एक बार जहाज गया था उस पहाड़ी के ऊपर से, वो भी गिर गया और उस कहानी को देवता का श्राप मानते हुए आज तक उस पहाड़ी के ऊपर से कोई जहाज नहीं गुजरा |
यहाँ से कुछ दूर ट्रेक करने पर हम पहुँचते हैं शिकारी देवी [Read Trek to Shikari Devi]के मंदिर में जो कि ३३०० मीटर कि ऊंचाई पे स्थित है, और यहाँ बर्फ गिरती है सर्दियों में भयंकर, पांच पांच फीट| इस मंदिर कि ख़ास बात ये है कि इस मंदिर कि छत नहीं है , लेकिन सिर्फ छत न होना इसकी ख़ास बात नहीं है, ख़ास बात है सर्दियों में बर्फ गिरने पर भी अन्दर रखी मूर्ती पे बर्फ नहीं गिरती, मैं कभी शिकारी देवी गया नहीं हूँ पर मैंने अत्यधिक पढ़े-लिखे लोगों के मुहं से ये बात सुन रखी है |
बिना छत का शिकारी देवी मंदिर
थोडा नीचे आने पे जन्जेहली (Janjehli Valley) में एक भीमशिला है जो नाम कि तरह भीमकाय है लेकिन हाथ कि सबसे छोटी ऊँगली से हिलाने पे हिल जाती है | हिमाचल का सबसे प्रसिद्द पास, रोहतांग पास भी देवता कि तरह पूजा जाता है | कहते हैं रोहतांग पास का मतलब है रूहों का घर , यहाँ सबसे ज्यादा मौतें होती हैं सैलानियों कि, क्यूंकि यहाँ मौसम किसी भी पल बदल जाता है | हर साल रोहतांग (Rohtang Pass) खुलने से पहले देव रोहतांग कि पूजा होती है ताकि कोई त्रासदी न हो और इसी पूजा से बोर्डर रोड ओर्गनाइज़ेशन के जवानों को भरोसा आता है माइनस २० डिग्री में काम करने का|
बात करते हैं कुल्लू जिला कि, कुल्लू हिमाचल का सबसे रहस्यमयी जिला है| यहाँ ऐसी ऐसी कहानियां, मंदिर, इमारतें मौजूद हैं कि बस आप कहानियां ही सुनते रह जाओगे| यहाँ कुल्लू का दुशहरा होता है जिसे अंतर्राष्ट्रीय दर्ज़ा मिला हुआ है, मेले कि ख़ास बात ये है कि जब तक देव रघुनाथ ना आ जाए, ये मेला नहीं शुरू होता| वैसा ही मंडी की शिवरात्रि में हैं की जब तक देव कमरुनाग नहीं आएगा, मेला नहीं शुरू होगा|
कुल्लू जिला में जात पात का भी बहुत लफड़ा है| किसी किसी गाँव में अनुसूचित जाति वाले लोगों को गाँव में नहीं घुसने दिया जाता, कहीं कहीं गाँव में तो जा सकते हैं पर घरों में नहीं जा सकते| मंडी जिले के कुछ गाँव जो कुल्लू जिले से लगते हैं, वहां भी जात पात का प्रचलन बहुत ज्यादा है| कोई चमार जाति का इन्सान हो, पहले तो ये समझा जाए की चमार कौन है? चमार वो है जो चमड़े का काम करे (चम/चर्म = skin), अब पुराने ज़माने में जब चमड़े से काम करते थे तो हाथ गंदे होंगे क्यूंकि टेक्नोलोजी नहीं थी, मशीन नहीं थी, और ऊपर से गरीबी| तो अनुसूचित आदमी मंदिर में नहीं घुसेगा | कुल्लू के बहुत से गाँवों में जात पूछी जाती है बात शुरू करने से पहले और वहां बहुत से गाँव ऐसे हैं जो एक्स्क्लुसिवली राजपूतों या ब्राह्मणों के हैं और वहां अनुसूचित जाती के लोग जा ही नहीं सकते | लेकिन अब जब रहन सहन काफी हद तक बदल गया है तो ये रीति रिवाज़ भी बदल जाने चाहिए|
कुल्लू दशहरे में देवता कि पालकी, कहते हैं ये पालकियां अपने आप घूमती हैं, इधर से उधर
वैसे ही महिलाओं के मंदिर में प्रवेश वर्जित होते हैं माहवारी (Periods) के दौरान, लेकिन आज जब ये टेक्नोलोजी भी बदल चुकी है, सफाई रखने के कई बेहतर और आसान तरीके मौजूद हैं, तो ये रिवाज भी अब ज्यादा मायने नहीं रखता है| पुराने रीति रिवाज़ तब तक वैलिड थे जब तक आसान तरीका नहीं था| एक तरीका नीचे देखें|
कुल्लू के लघ घाटी में एक गाँव है सेओल, वहां एक जंगल है जिसके पेड़ कम से कम सौ साल पुराने हैं, ये सारा जंगल देवता का है और एक पत्ता भी वहां तोड़ना मना है उस जंगल से| पकड़े जाने पे मंदिर में पेशी लगती है और जुर्माना अलग| अब सोचा जाए तो सौ साल पुराने जंगल को बचाने के लिए कोई कहानी तो बनानी ही पड़ेगी, तो देवता का नाम दे दो और फिर कोई कुछ नहीं करेगा| बिना चालान होने के डर के लोग हेलमेट नहीं पहनते तो जंगल को तो बिना डर के लोग तहस नहस कर देंगे, तो इसलिए देवता का नाम जरुरी है इतने पुराने जंगल को बचाने के लिए| कई गाँवों में देवता के नाम पे हेरिटेज कंजर्व भी हुई है, इसमें कोई दो राय नहीं |
यहाँ से चले जाएँ किन्नौर कि और तो वहां भी यही कहानी है, देवी देवता की | एक जगह है तरंडा ढांक (Taranda Temple) , ढांक पहाड़ी में खाई को कहते हैं| शिमला से किन्नौर में घुसते ही तरंडा ढांक आती है, एकदम सौ-दो सौ फीट खड़ी पहाड़ी और नीचे उफनती हुई सतलुज नदी, गिरने पर बचने का कोई स्कोप नहीं| तो तरंडा मंदिर के पास आने जाने वाले हर एक गाडी रूकती है, जो नहीं रुकता वो सतलुज में समा जाता है, ऐसा लोगों का मानना है| जिन लोगों को इस बारे नहीं पता होता वो लोग दैवीय प्रकोप से बच जाते हैं, पर जो जान बूझ के न रुके, वो नदी में समा जाता है, ऐसा माना जाता है, किन्नौर में इस मंदिर की बड़ी मान्यता है | बात सही भी है, किन्नौर कि सडकें हैं तो चौड़ी पर अगर गिर गए तो मौत निश्चित है, इसलिए तरंडा ढांक का डर/भरोसा आदमी कि जान बचाने में काफी कारगर साबित होता है|
ऐसा ही स्पीति में कुंजुम पास में होता है, एक मंदिर है कुंजुम टॉप (Kunjum Pass) पे, वहां आने जाने वाली हर गाडी रूकती है, यहाँ तक की अँगरेज़ भी, नहीं तो कुंजुम की घुमावदार सडकें लील लेती हैं इंसान को| ऐसा ही मंडी से मनाली जाते हुए हणोगी माता के मंदिर में होता है , जो रुका नहीं वो रुकता भी नहीं सीधा ऊपर पहुँच जाता है, ऐसा माना जाता है |
कुंजुम टॉप, पीछे मंदिर दिख रहा जिसके इर्द गिर्द चक्कर लगाके लोग आगे बढ़ते हैं |
तरंडा ढांक, ऐसी सड़कों पे भरोसा (खुद पे,किसी और पे) बड़ा जरुरी है, कई सौ मीटर नीचे सतलुज नदी बहती है
यहाँ सतलुज और स्पीती नदियों को भी देवी कि तरह पूजा जाता है | यहाँ पहाड़ों की पूजा होती है | यहाँ पत्थर, मिट्टी, जंगल सब की पूजा होती है| जितने भी ऊँचे ऊँचे पहाड़ है, पास है, टूरिस्ट प्लेसेस हैं सब जगह आपको मंदिर जरुर मिलेगा| और कई जगह तो सिर्फ मंदिर होने कि वजह से टूरिस्ट प्लेस बन गया है |
मेरे ख्याल से यहाँ पूजा करते हैं प्रकृति कि, कहीं नदी कि, कहीं पानी कि, कहीं बर्फ कि, कहीं पत्थर कि क्यूंकि हमें मालूम है कि सब प्रकृति के अधीन है, प्रकृति एक ऐसी रहस्यमयी रचना है कि जिसे बूझ पाना अभी तक मुनासिब नहीं है, पहाड़ों में तो बिलकुल भी नहीं, तो सबसे अच्छा तरीका यही है कि भरोसा रखो, और काम किये जाओ| बस ये भरोसा अन्धविश्वास नहीं बनना चाहिए |
कहाँ से ये कहानियां जन्मी, ये घटनाएं सच में हुई या नहीं, किसीने देखा या दिमाग का फितूर है, इस सब पे गौर ना करें तो हम देखेंगे कि पहाड़ों में प्रकृति पे भरोसा करना बहुत जरुरी है, ऊंचाई पे बसे घर, पहाड़, बादल, बर्फ, नदी, नाले, कुछ भी, कभी भी विपदा ला सकता है, और कई कई सालों सिर्फ भरोसे के दम पे इंसान ने काफी कुछ कर दिखाया है| कुंजुम, रोहतांग पास की सडकें, किन्नौर का मौसम, कुल्लू के बादल, इन सबका कोई भरोसा नहीं है| कोई भी इन्सान हो, उसे हिम्मत , विश्वास होना बड़ा जरुरी है इन जगहों पे की कुछ गलत नहीं होगा, और शायद इसलिए ही ये मंदिर बने , ये रुकने - रोकने की प्रथाएं चली, की देवता ने आशीर्वाद दे दिया है, अब कुछ गलत नहीं होगा, ये एक भरोसा पैदा करने की टेक्निक थी जो धीरे धीरे अंधविश्वास बन गया|
लेकिन ये सब जरुरी भी है और नहीं भी|
वक़्त के बदलने के साथ रीति रिवाज़ भी बदलने जरुरी हैं क्यूंकि रीति रिवाज़ एक लिमिटेड समय तक ही वैलिड रहते हैं उसके बाद अन्धविश्वास बन जाते हैं| जात पात, देवता का श्राप, देवता की नाराजगी ये सब बातें गौर करने लायक हैं की अब जब हमारे रहने , खाने, पीने, और जीने में काफी हद तक बदलाव आ गया है, क्या जरुरी नहीं है की अब इनपे निर्भरता कुछ हद तक कम की जाए?
देवता के आदेश से कई बार सुपर अड्वेंचर भी हो जाता है, यकीन नहीं आता तो ये देखिये, भुंडा महायज्ञ [Read More About Bhunda Story] का एक विडिओ जोकि २००६ में शिमला के रोहडू में आयोजित हुआ था|
भुंडा महायज्ञ, मौत का खेल, देवता का भेस, रोहडू (शिमला)
P.S: One of my friends has done her research work in the aforementioned regions during her Masters and she has experienced most of these things herself. She has worked in the remotest villages of Kullu Valley, Malana Village, Kinnaur, Upper Mandi, and Old Manali Town. Her research has revealed many astonishing facts about the upper reaches of Himachal Pradesh.
A motorcyclist always admires two things; a smooth road with no potholes, and a road that offers extreme challenge, full of mud, potholes, boulders, and bumps. A motorcycle ride to Lake Parashar offers you all this.
Coming from any direction, be it from Manali, Pathankot, or Delhi, you ride through National Highway(s) making it a comfortable journey with picturesque beauty, cool breeze, and no traffic hassles.The road to Parashar Lake diverges from the main road to your right on the National Highway 20 towards Jogindernagar/Pathankot as you leave the Manditowncity. The first few kilometers are an uphill ride until you gain a height of few hundred meters. Even if you ride leisurely you will find yourself going out of the road to save your ass because the roads are narrow, unreasonably steep and a speeding bus coming from the opposite direction will mark the occasion there and then for you, if you are not so fond of blowing horn.
The overall distance between Mandi and Parashar is 49 kilometers and the road remains smooth until you have reached Bagi. Local residents prefer to walk from here and take not more than an hour or two to reach at the top. The buses do not go beyond this place, so you have only two options from here, trek your way up to the lake or try to find a cab. Sometimes you find cabs waiting there for passengers, if luck favours you.
Near Bagi
Lake Parashar @ 2750 Meters
PWD has somehow managed to construct the road and maintain it, so your vehicle can go to the top from Bagi. However, the road is all boulders and dust, so it could be nasty and tiring if you are not used to such roads. During the rainy season the road disappears and situation becomes slushy, something you encounter between Marhi (मढ़ी) and the Rohtang top [Read Riding Mania] Once you reach the top, you have to walk few hundred meters before you can witness this beautiful creation of nature.
It is believed that Parashar Rishi meditated in this region for almost 20,000 years. I am not sure how he did that but it is believed that he did it, so I don't doubt that. The architecture of the temple is Pagoda Style and there are not many temples built this way in Himachal. The Hadimba Temple in Manali is the only one I can think of right now. The lake is actually a small pond and a suspended land mass floats on it. On a windy day you will see this land mass making rounds across the lake, from one corner to another.
Lake Parashar
Spot Solar Lights?
The lake is guarded by barbed wires and a gate is put up so that tourists do not spoil the water or feed fishes. A government official (CJM) was also there on a non-official trip with his family. The then CJM of Kullu, I forgot his name, decided to take the matter into his hands andaskedthreatened the caretaker of the premises to open the gates so that he and his circus party could make their trip memorable. The logic behind locking the gates is religious beliefs of people because if they find the gates open, they will pour their hearts out in the lake in the form of flowers,prasad, plastic, and whatever they think will help them wash their sins. CJM stands for Chief Judicial Magistrate, in case you don't know.
Parashar Temple
Wood Work
Moving forward, there is another temple in the vicinity, few hundred meters from the main temple in the jungle. It is calledMajholi Mata (मझोलीमाता)temple and she was the better half of Parashar Rishi. The priest of the temple told us that she was not happy with whatever Parashar Rishi was doing with histapasyaand meditation, so she decided to walk away. I think she did the right thing by walking away. Who would wait for 20, 000 years anyways? Furthermore, Parashar Rishi thought of bringing her back so he tried to reason with her and managed to get her back. In the meantime, the lady had cried her heart out and we have another lake formed from her tears. The other lake is all muddy now and it’s not until the rainy season it gets its share of water. You can seegujjarsresting near that lake, their sheep and mules producing psychedelic noises.
Majholi Temple
There are few abandoned buildings that are used by people during festivals near the main temple. I stayed in one of those old houses in October 2007 and believe me that was the coldest night of my life, one blanket, two people, broken windows, and other supernatural things happening outside that scared us to death. Casteism in these parts of Himachal is still prevalent. Kullu, Mandi, Kinnaur, and other upper reaches still support or fear the primitive rule of differentiating human beings by their surnames. So if the priest or his teammates ask your name with an emphasis on your surname, don’t be surprised. Such is life in these parts of our state.
We were told that the priests visit the temple even when the whole region is six feet deep covered with snow.
Union of Deities, Dev Mahunag meets Parashar Rishi, these meetings happen frequently. People believe that through such meetings the Gods solve their problems. The event of divine union was hypnotising.
The Purification Process before the deities meet
I think the best time to visit Parashar is November-Decmeber, when the mountain ranges are full of snow. There are two guesthouses, can be booked from Mandi DC office or DFO Office. Camping is always an option.
If you are an adventurous couple, this could be a great place for honeymooning, otherwise Manali is just 80 kilometers from here.
P.S: One of the newly formed IITs, IIT Mandi lies on the way at Kamand. When we visited IIT Mandi in 2010, all we could see was weed grown everywhere, the green grass as they say it. Hopefully, they have removed the weed by now.
भारत के लगभग हर छोटे बड़े शहर में किला होगा, हिमाचल में जहाँ जहाँ मैं घूमा हूँ, वहां सब जगह मैंने किले देखे हैं, कुछ धूल खाते हुए तो कुछ नयी चमक के साथ घुमक्कड़ों को आकर्षित करते हुए | राजा रहता सिर्फ कुछ चुनिन्दा किलों में था, और बाकी उसके सरहदी किले होते थे| हमले की स्थिति में चेतावनी देने के लिए और कभी रंगरलियाँ मानाने के लिए| आपने सुना होगा कि हमले होने पर किले कि मीनारों में आग लगा दी जाती थी ताकि सेना, राजा, और प्रजा चौकन्नी हो जाए | ये धुआं दूर दूर तक देखा जा सकता था, सरहदी किले में आग लगने का मतलब होता था बंदोबस्त तैयार कर लो, जैसा शायद लार्ड ऑफ़ द रिंग्स मूवी में भी हुआ था, आग लगाओ, धुंआ बनाओ, और तैयार हो जाओ, जंग के लिए | वैसा ही एक सरहदी किला यहाँ हमीरपुर में भी है, हमीरपुर वैसे तो जाना जाता है पढाई-लिखाई के लिए, कुछ लोग इसे एडुकेशनल कैपिटल ऑफ़ दी स्टेट के नाम से भी पुकारते हैं, टूरिस्म के नाम पे यहाँ एक पार्क है जिसमें बच्चे कम , दिलजले आशिक और नशेड़ी लोग ज्यादा घूमते हैं , और बाकी सब हवा हवाई ही है| लेकिन एक छोटा सा गाँव हैं यहाँ महल, और वहां है राजाजी का किला|
हमीरपुर का नाम रखा गया था राजा हमीर के नाम के नाम पर , और राजा होगा तो किला भी होना चाहिए| काफी खोज बीन के बाद किले का पता चला तो हम निकल पड़े कैमरा और मोटर-साईकिल उठा के | किला संसार चंद कि रियासत का किला था जिनका सबसे प्रसिद्द किला काँगड़ा में है| जगह का नाम तो राजा हमीर के नाम पर है लेकिन जो महल का किला है उसे संसार चंद -II ने बनवाया है, 1775 -1823 के आस पास | किले तक पहुंचना आसान काम नहीं है, क्यूंकि सड़कों का जो जाल है हमीरपुर में, वो बस किले कि तरफ नहीं जाता, बाकी तो सड़कों कि भूल भुलैयां है ये जगह| बड़े शहरों में गुम होना तो आपने सुना होगा, यहाँ हमीरपुर में भी गुम होने के बड़े किस्से हैं, हर मोड़ पे लिंक रोड है, इधर से घुसो उधर निकल जाओ, हर तरफ सड़कें ही सडकें, ग्रोथ से कभी कभी परेशानी भी हो जाती है|
ये पगडण्डी किले तक नहीं जाती है, रास्ता भटकना आसान बात है
खैर, किले तक पहुँचने के लिए मेन रोड छोड़ के अन्दर जंगलों में जाना पड़ता है, और सड़क से किला दिखता भी नहीं है | गाँव के बीच से एक छोटी सी (कुनाह) खड्ड है जो आपको किले तक ले जाती है, आस पास इक्का-दुक्का घर हैं और जंगल ठीक ठीक बड़ा है | साथ ही में एक पांडव शैली में निर्मित एक मंदिर है, कितना पुराना है कुछ कहा नहीं जा सकता| खड्ड पार करते ही सामने भगवान का द्वार दिख जाता है, भगवान का द्वार माने शमशान घाट, गाँव के लोगों कि मानें तो ऐसा "शानदार" शमशान घाट पूरे राज्य में कहीं नहीं मिलेगा| वैसे मेरे ख्याल से सुंदरनगर, मेरे गृह नगर का शमशान घाट बड़ा शानदार है, एकदम झील के किनारे, ठंडी हवा चलती है आग से गर्मी भी नहीं लगती लोगों को|
विहंगम दृश्य
सामने महल गाँव दिखता है, कितनी ऊंचाई होगी?
रेस्ट हट, अंडर कंस्ट्रक्शन
पंद्रह से बीस मिनट कि चढ़ाई और सामने दिखाई देता है किला, किला क्या है किले के बस अवशेष ही बचे हैं| टूटी हुई चार दीवारें और खूब सारी घास| घास चार से पांच फीट बड़ी थी तो चलने में दिक्कत हो रही थी| आस पास के इलाके में इसे गढ़ के नाम से जाना जाता है, और गाँव के सर पन्च कि मानें तो ये किला तीन से चार मंजिला हुआ करता था कभी, अब बस इसका टॉप फ्लोर ही , टाप फ्लोर कि दीवारें ही बची हुई हैं| वक़्त कि चोट और लोगों के लालच ने इस किले का बेडा गरक कर दिया है| किला खड्ड से कम से कम ५०-५५ (७०-८० भी हो सकता है मेरी सिविल इंजिनीयरिंग थोड़ी कमजोर है) मीटर ऊपर होगा और किले कि ऊंचाई भी इतनी ही होगी, कहते हैं कि किले के टॉप फ्लोर से इमरजेंसी एक्सिट के लिए एक सुरंग बनायीं गयी थी जो सीधी जाके नीचे खड्ड के उस पार निकलती थी|
इसके नीचे है सोना और छिपी हुई सुरंग, तीन मंजिलें और अनेकों कहानियां दबी हुई है यहाँ
सनसेट का नजारा, स्मोक का सहारा
फिर जब राज ख़तम हो गए, राजाओं के भी और ब्रिटिश राज भी, तब यहाँ लोगों ने आना जाना शुरू किया, कभी घास के लिए तो कभी सोने के लिए| किले में कहा जाता है अथाह सोना दबा हुआ है मलबे के नीचे , जिसको निकालने के लिए लोग जाते है कुल्हाड़ी-फावड़ा लेके, लेकिन कभी गाँव के लोग पीट के वापिस भेज देते हैं तो कभी पोलिस आके धुलाई कर देती है, सोना है या नहीं , ये कहना मुश्किल है पर रहस्य पूरा रामसे ब्रदर्ज कि फिल्मों वाला है|
दैवीय जलस्त्रोत, इसके साथ में एक प्राचीन मंदिर है
महल मोरियां जो कि इस किले का आफिशियल नाम है, इस किले में दो लड़ाईयाँ हुईं थीं, लड़ाई नहीं दो भीषण युद्ध| पहली बार तो गुरखों को राजा संसार चंद कि सेना ने मार भगाया लेकिन दूसरी बार की हार राजा जी के गले कि आफत बन गयी, राज पाट सब छूट गया इतनी करारी हार का सामना करना पड़ा राजाजी को| राजा संसार चंद का काँगड़ा किला (पढ़िए - मुसाफिर हूँ यारों पे) भी इस लड़ाई के चक्कर में गुरखों के हाथ लग गया, मुझे लगता है ये गुरखा राजा वही "अमर सिंह थापा जी " है जिनका किला जलोड़ी पास में है (रघुपुर किला -जलोड़ी पास, पढ़िए )|
संसार चंद - II ने सुंदरनगर/मंडी के राजा इश्वर सेन को बंदी बनाके रखा था और गुरखे उनको भी छुड़ा ले गए अपने साथ| इश्वर सेन को संसार चंद ने बारह साल तक नादौन के अमतर (पढ़िए अमतर की कथा) स्थित किले में बंदी बना के रखा, आठ साल और होते तो वीर-ज़ारा बन जाती| गाँव वालों कि बातों और किंवदंतियों पे गौर फरमायें तो पता चलता है कि महल मोरियां का किला पूरे छह महीने तक जलता रहा, इतनी आग में सोना बचा होगा, ये कह पाना जरा मुश्किल लगता है| मंडी की महाशिवरात्रि का भी इस किले से गहरा सम्बन्ध है|
राजा का वजीर एक मुसलमान था और आज भी उसके वंशज इस गाँव में रहते हैं| सबसे हैरानी कि बात ये है कि इस गाँव में एक भी राजपूत नहीं है, मतलब कि जब आग लगी और मार पड़ी, तो राजा जी अपनी सारी बिरादरी को साथ ले गए| वहीँ पास में एक गाँव है ताल, ताल और महल का नाम एक साथ लिया जाता है, जैसे कि हारसिपत्तन (पढ़िए रहस्यमयी नगरियाँ), ताल दो कारणों से फेमस है, एक वहां एक ताल (जलाशय) हुआ करता था जहाँ राजा के घोड़े बंधा करते थे| और दूसरा रूमी वैद, कहते हैं उसके हाथों में जादू था, हड्डी कैसे भी, कहीं कि भी, कितने भी एंगल पे टूटी हो, रूमी वैद उसको ठीक करने कि कुव्वत रखता था| पूरे हिमाचल में सिक्का चलता था रूमी वैद का, जो हमीरपुर में पले बढे हैं, २००० से पहले कि जेनेरेशन , उन सबने इन भाई साहब का नाम सुना है| अब शायद अल्लाह को प्यारे हो गए हैं, पर मैंने उनके जितना किसी और का नाम नहीं सुना है , उनसे ऊपर शायद डाक्टर बंगाली ही होंगे , नो डिस-रिस्पेक्ट |
जंगलात महकमे के लोगों कि ड्यूटी लगती है उधर, ताकि लोग लकड़ी, घास न ले जाएँ सरकारी जमीन से, बस किले को बचाने के लिए कोई नहीं आता शायद, मुझे ये नहीं समझ आता कि मुझे किले देख के ख़ुशी होनी चाहिए या दुःख? किले बनवाए जाते थे लोगों से, बिना मशीनरी के, किले तक पैदल चढ़ने में हवा निकल जाती है, तो जो मजदूर सामान लेके जाता था ऊपर, पत्थर, लकड़ी, पालकियां, उनका तो आधा जन्म ही ढुलाई में निकल जाता होगा, साला अजीब ही हिसाब किताब है जिंदगी का, किसी न किसी को तो मजदूरी करनी ही पड़ती है, चाहे राजतन्त्र हो या प्रजातंत्र|
हमारी सभ्यता, इंजिनीयरिंग के प्रतीक हैं ये किले या बेवकूफी के, मैं कुछ समझ नहीं पाया हूँ इस बात को|
रजवाड़े ख़तम हो गए. किले टूट गए सारे पर मजदूर आज भी मजदूर ही हैं , तब भी पत्थर ढ़ोते थे, अब भी पत्थर ढोते हैं|
Imagine yourself riding through the Great Rann of Katchh (रण) on a motorcycle. You will wonder why didthe almighty nature create this strange thing called desert. The answer will dawn on you sooner or later as you dig deep in the desert land. You might not see human beings but the place has a population of several thousand migrant Cranes, and birds of different sorts coming to absorb the eternal silence prevailing in the Rann of Katchh. Witnessing the phenomena of Chir Batti is something one would not like to miss, just imagine colorful lights dancing in the desert, ten to twenty feet above the land, with no scientific explanation attached to them. Chir Batti, simply speaking, means dancing “Ghost Lights”.
Not so long ago we saw a Bajaj advertisement that talked about a village where common spoken language is Sanskrit. 283 kilometers away from Bangalore at the intersection of NH-204 and NH-13 near the historic city of Shimoga, the cultural capital of the state. No wonder they all speak Sanskrit fluently. Surprisingly, that's not the only village; Hoshalli village situated on the banks of Tunga River also shares the similar qualities. A Sanskrit breakfast sounds interesting, isn't it?
The old ghost town of Dhanushkodi in Tamilnadu has an eerie silence around it. It is a village where no one lives, the whole village was destroyed in 1960s in a Tsunami and since then it has remained a mystery for the visiting tourists and the Indian Navy.Breathtaking beauty, the nearest telephone about 20 km away, out of reach of mobile signals and the feeling of being in a place which was once alive, now reduced to rubble, makes it a place truly less travelled. And standing at the tip of India is a pretty heady feeling! In case you have not yet stepped foot on the foreign waters, Srilanka is just 13 kms away from here.
The war of Kalinga would have troubled you because remembering the names and dates was never an easy task and history, as a subject demanded that. What about switching to audio-visual mode to learn history? All you need to do is to travel across Orissa, formerly known as Kalinga, where the popular king Ashok denounced his lust for power.
Ride a few hundred kilometers up north and you will reach a place, which does not look like a part of this country; neither is treated as one by the media and the government. Sikkim, Nagaland, Assam, Arunachal Pradesh, all these states are pretty much Indian and believe me unless you go there, you will not realize what the whole nation has missed by not knowing about these states.
Bihar, Jharkhand, and Chattisgarh are three states popular for bad reasons, Naxalism being the worst of them. Ironically, the best and forgotten story of our nation is buried somewhere in these states. India's scientific and educational history is synonym with Viashali, Gaya, Nalanda, Bastar. Almost every village and town in the aforementioned states has something to say about India's glorious past. Riding though these states might not make you a wise man but we can always hope for the best.
Put all these pieces together, from the holy hills of Himachal to the lonely lands of the Dhanushkodi, not to forget the express-ways, the national highways, and unpaved roads and you will get a mystically colored picture of the great Indian nation. That's what we plan to do, ride across the nation on a motorcycle before we become too old to live the dream.
Gear up for an adventurous ride, it’s time to take a leap of faith. From the Northern Corner of India to every possible corner on every possible side, North, West, South, and East included.
15,000 kilometers, two men, one dream
Most people I know who "waited" to travel the world never did - Anonymous
मिनिबस खड़ी थी सड़क के बीचों बीच, सवारियों के इन्तेजार में | ये मिनिबस का भी एक जूनियर वर्ज़न था, ट्रेडिशनल पीला रंग, गाडी के पीछे "हनी-बनी-ते-मनी दी मोटर" लिखा हुआ था काले रंग में, और बस के आगे लिखा था "दिलजले" | बस का रूट देखा तो बस वहीँ जा रही थी जहाँ मुझे जाना था, नवोदय स्कूल | किस्मत से मेरी डेस्टिनेशन आखिरी डेस्टिनेशन थी नहीं तो बस ऐसे ऐसे रह्समायी गाँवों और रास्तों से होके जाती है की आदमी गुम हो जाए पर मंजिल तक न पहुंचे | हमीरपुर डिस्ट्रिक्ट की ख़ास बात ये है की यहाँ सड़कों का मायाजाल है, सबसे ज्यादा घनत्व है यहाँ सड़कों का पूरे राज्य में [रोड डेन्सिटी] और ऊपर से मुख मंत्री का गृह नगर | किसी भी रोड पे गाडी दाल दो, अवाहदेवी या भोरंज निकल जाती है वो सड़क और हर एक गाँव के लिए सड़क है |
अपनी मोटर-साईकिल से उतरते ही मैं बस में घुस गया और मुझे खिड़की वाली सीट मिल गयी , जो की अक्सर होता नहीं है | गाँवों की बसों में खिड़की वाली सीट मिलना बड़ी मेहनत-मशक्कत का काम है | अख़बार, झोले, सब्जी के लिफाफे रखके लोग अपनी सीट मार्क कर लेते हैं, आप खाली समझ के बैठ जाओगे और बस चलने से पहले ही सीट का मालिक आ धमकेगा |
गाँव की बसों में ट्रेडिशनल सी-ऑफ करने के तरीके नहीं चलते कि जब तक बस नहीं जाती खड़े रहो और बस छूटने पे टाटा-बाय करो, ये बसें जन्म-जन्मों तक खड़ी रह सकती हैं, सवारियों के इन्तेजार में, हीर-राँझा का प्यार कम पड़ जाता है कई बार, नहीं चलेंगी तो नहीं चलेंगी, इसलिए मेरा दोस्त मुझे छोड़ के निकल लिया | बस के कंडक्टर मेनेजमेंट गुरुओं को भी पानी पिला देने वाले पैंतरे इस्तेमाल करते हैं सवारियां "ढ़ोने" के लिए इस करके बसें लाश कि तरह खड़ी रहती हैं |
खैर बस अगले ४५ मिनट तक वहीँ खड़ी रही, निर्जीव और स्थिर| फिर थोड़ी देर बाद बस का कंडक्टर आया , थोड़ी देर मतलब ४५ मिनट बाद , पर बस का कंडक्टर और अस्सिटेंट कंडक्टर अभी तक सीन में नहीं थे | गाँव की बसों में अस्सिस्टेंट कंडक्टर होते हैं , आलमोस्ट सब बसों में क्यूंकि अक्सर बसों में भीड़ बेतहाशा हो जाती है और एक कंडक्टर सब सवारियों को मैनेज नहीं कर पता है , तो सवारियों में से ही कोई स्कूल या कालेज जाने वाला नौजवान , असिस्टेंट कंडक्टर का रोल प्ले करता है | इसके निम्नलिखित फायदे हैं:
अ) लड़की पटाने में सुविधा होती है, लड़की को रोज सीट दिलवा दो तो लड़की पटने के चांसेज बढ़ जाते हैं
ब) कंडक्टर से दोस्ती हो जाती है, कंडक्टर गाँवों/छोटे शहरों में बहुत काम की चीज़ होती है
स) किराया नहीं लगता
फिर पूरे एक घंटे खड़े रहने के बाद और "अगम कुमार निगम"के दर्द भरे गीत सुनने के बाद बस में जान आई, सवारियों को ज्यादा फरक नहीं पड़ा, पर मेरी रुकी हुई धड़कन एक बार फिर चल पड़ी, बस थोड़ी देर और रुकी रहती तो मैं १२ किलोमीटर कि यात्रा पैदल ही तय कर लेता | कंडक्टर ने १०-२० लोगों को छत का रुख करने को कहा और खुद गुटका चबाता हुआ [राह चलते] लोगों से गप्पें मारता हुआ बस को चलने का आदेश दिया | रविवार के दिन बसें कम होती हैं, और सवारियां इकठी हो हो के अथाह हो आती हैं, तो बस के अन्दर पूरा कुम्भ का मेला लगा हुआ था, और मेरे बगल में बैठी हुई आंटी मजे से मूंगफली खा रही थी और छिलके बस में ही फेंक रही थी , एकदम आराम से, भीड़ भड़क्के से कोई फरक नहीं पड़ा उसको| मूंगफली मुहं में और छिलका बस के अन्दर, एकदम अचूक निशाना |
खैर बस चली, धीरे धीरे, मेरी परेशानी का लेवल बढ़ता चला गया और सवारियां उतरती चढ़ती चली गयीं, पांच उतरती थी, दस चढ़ती थी, भीड़ ख़तम होने का नाम नहीं लेती थी| पूरी बस में मुझे छोड़ के कोई भी विचलित नहीं था बस की देरी को लेकर के, उनके लिए रोज का काम था, उनके लिए इन्तेजार करना ही जीवन है और मेरे लिए तेज़ भागना, जल्दी जल्दी, सब कुछ जल्दी चाहिए, बस एकदम से| वहां जिंदगी बहुत धीमे से चलती है गाँव में| धीरे धीरे गाँव बदल रहे हैं, जमीन है पर खेती नहीं है क्यूकी अब खेती नहीं कोई करना चाहता, कुछ आई.आई.एम् और आई.आई.टी वाले कहते हैं कि खेती करेंगे पढ़ लिख के पर बाकी सबको शेहेर जाना है| मेरा एक दोस्त है आई.आई.एम् लखनऊ का , कहता है गाय पालेगा, खेती करेगा, भाई अच्छी बात है, बहुत अच्छी बात है, खेती नहीं करेगा तो शेहेर वाले तो कहीं के नहीं रहेंगे, अब पहाड़ों में हरियाली न रही तो काहे के पहाड़? पूरे डेढ़ घंटा गाँव गाँव में घूमने के बाद मैंने पांच किलोमीटर का सफ़र तय किया, अब मैं भी एक गाँव वाला हो चुका था, कोई जल्दी नहीं, कम से कम एक बस तो है , पैदल चलने से तो वही अच्छा है, यही संतुष्टि का भाव लिए उतर गया मैं |
मैं भी एक गाँव में ही रहता हूँ सुंदरनगर में , आप भी एक गाँव से ही आये हैं, आज दिल्ली, मुंबई, गुडगाँव में हैं, पर घर आपका भी गाँव में ही है, एक छोटा सा गाँव, जहाँ आज भी वही मिनी बस चलती है, कम सीटें और ज्यादा सवारी के साथ| वहां बसों का इन्तेजार करना एक जरुरत है , आएगी तो आएगी नहीं तो पैदल चलो| मंडी, काँगड़ा, हमीरपुर, सोलन, कुल्लू, शिमला, सब जगह यही मिनिबस चलती है, वही पीला रंग, वही शेर-ओ-शायरी , वही दिलजले ड्राइवर, और वही घिसे-पिटे से रूट |
पर कभी घर आओ "एक हफ्ते" कि छुट्टी पे तो बैठना इस मिनिबस में, मजा आएगा |